हिंदू पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन की कहानी सबसे प्रसिद्ध और रहस्यमयी मानी जाती है। यह कथा देवताओं और असुरों के बीच अमृत की प्राप्ति के लिए हुए महासंग्राम की है।

कहानी की शुरुआत
एक बार ऋषि दुर्वासा ने इन्द्र को एक दिव्य माला दी, जिसे उन्होंने अपमानजनक तरीके से अपने हाथी ऐरावत की सूंड पर डाल दिया। इस अपमान से क्रोधित होकर दुर्वासा ने इन्द्र को श्राप दे दिया कि तुम्हारा वैभव नष्ट हो जाएगा। इससे देवताओं की शक्ति घट गई और असुरों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया।
अमृत की खोज और समुद्र मंथन
भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों से मिलकर क्षीर सागर का मंथन करने का निर्णय लिया, ताकि अमृत प्राप्त किया जा सके। मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। भगवान विष्णु ने कच्छप अवतार लेकर पर्वत को सहारा दिया।

समुद्र से निकले 14 रत्न
मंथन से क्रमशः कई दिव्य वस्तुएं निकलीं –
- हलाहल विष (जिसे भगवान शिव ने पीया)
- कामधेनु
- ऐरावत
- कल्पवृक्ष
- लक्ष्मी देवी
- धन्वंतरि (अमृत कलश के साथ)
… कुल 14 रत्न निकले।
अमृत का वितरण
जब अमृत निकला, तब असुरों ने उसे हड़पने की कोशिश की। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत देवताओं को बाँट दिया। एक असुर राहु ने धोखे से अमृत पी लिया, लेकिन सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया, जिससे उसका सिर अलग कर दिया गया। उसका सिर राहु और शरीर के भाग को केतु कहा गया।

निष्कर्ष
समुद्र मंथन की यह कथा हमें बताती है कि सहयोग, धैर्य और चतुराई से किसी भी संकट का समाधान संभव है। यह हिंदू धर्म की सबसे अधिक खोजी जाने वाली और शिक्षाप्रद कहानियों में से एक है।
